
धीरे-धीरे समय बीतता गया, भक्ति का बीज ह्रदय में अंकुरित होता गया….ठीक इसी प्रकार एक तरह परमात्मा की कृपा से संयोग था कि मारवाड़ माटी के सुप्रसिद्ध गुरूवर संत श्री राजारामजी महाराज व बाल संत श्री कृपारामजी महाराज जगह-जगह कथा, सत्संग, प्रवचन करते हुवे नजदीक श्रीमद भागवत कथा करने पधारे, आपकी रूचि के अनुसार आप भी कथा, सत्संग सुनने पधारे और आप उनकी ओजस्वी, अमृतमयी वाणी सुनकर अतिप्रभावित हुए और अमृत वचन सुनकर आपने अपने जीवन का सत्य समझ लिया…और गुरूजी के शिष्य बनने व उनके साथ रहने की ठान ली । इस बात से जब आपने माता-पिता से अवगत कराया तो आपकी छोटी उम्र को देखते हुवे माता-पिता ने गुरूजी के साथ जाने से मना कर दिया, फिर आपश्री अधिक सत्संगी व वैरागी होने के कारण और आपकी कल्याणकारी भावना को देखते हुवे माता-पिता ने हाँ भर ली और एक साल बाद गुरूजी के साथ रहने की आज्ञा दे दी, फिर आपने जब सांसारिक माता-पिता के पैर छुए तो माता-पिता का वात्सल्य फूट पड़ा और आँखों से अश्रुधारा बह निकली, लेकिन चहरे पर उत्साह का भाव था कि मेरा बेटा संत बनेगा…धन्य हो ऐसे माता-पिता जिन्होंने अपने कलेजे के टुकड़े अपने पुत्र को सनातन धर्म के लिए समर्पित कर दिया और आपने मात्र 7 साल की अल्पायु में संत जीवन अपना लिया, गुरूजी की शरण में आ गए ।
बाद में आपने गुरूवर संत श्री राजारामजी महाराज व श्रद्धेय संत श्री कृपारामजी महाराज से संन्यास दीक्षा ली, और गुरूदेव ने आपश्री को 6 वर्ष बाद भेख़(भगवा) दिया । आज आप ईश्वर की अनुकम्पा व गुरू कृपा से आध्यात्मिक पथ पर आगे बढ़ रहे हैं । आपश्री निश्वार्थ व जनकल्याण की भावना से श्रीमद भागवत कथा, शिव महापुराण, श्री रामकथा, नैनी बाई रो मायरो, सत्संग-प्रवचन, भजन-संध्या, ध्यान योग शिविर आदि पुनीत कार्य करके जन-जन को लाभान्वित कर रहे हैं । आध्यात्मिक के साथ-साथ आपश्री शिक्षा को भी जारी रखा अभी आपश्री संस्कृत साहित्य व हिंदी साहित्य में शास्त्री की योग्यता हासिल कर रहे हैं, उसके बाद आचार्य की डिग्री प्राप्त करेंगे ।
आपश्री को सन्तों की अनुभव वाणी, संस्कृत, हिंदी व मारवाड़ी भाषा अति प्रिय हैं ।
